समय समय पर इस धरती पर अनेक संत महापुरूष अवतरित हुए हैं जिन्होंने लोक कल्याण के लिए असाधारण कार्य किये और दिव्यपुरूष कहलाए ।वर्तमान में ऐसे ही एक दिव्यपुरूष हैं। स्वामी सुदर्शनाचार्य जी देश भर में स्वामी सुदर्शनाचार्य जी के लाखों भक्त हैं जो उन्हें नारायण का साक्षात्र अवतार मानते हैं और तदानुसार उनकी पूजा अर्चना करते हैं ये भक्त विशेष से नही हैं बल्कि इनमें सभी जाति धर्म वर्ग के लोग हैं । इनमें एक ओर जहां निर्धन शिक्षित अशिक्षित किसान मजदूर है वही दूसरी ओर राजनेता प्रशासनिक अधिकारी उद्योगपति एवं व्यापारी आदिआधुनिक सम्पन्न परिवारों के पढे लिखे लोग भी हैं । इनमें से बहुत से ऐसे भी है जो गुरूदेव जी के संपर्क में आने से पूर्व मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित अर्थात नास्तिक रहे हैं।
गुरूदेव का इस भू मंडल पर अवतरण 27 मई को राजस्थान में जिला सवाई माधोपुर के पाडला गॉव के एक सम्पन्न ब्राहृाण किसान परिवार में हुआ था।
राजस्थान में जिला सवाई माधो पुर के गॉव पाड़ला के सम्पन्न ब्राहृण किसान परिवार में जन्मे श्री सुदर्शनाचार्य ने बटाखटला वन्दावन में परम गुरू श्री गोविन्दाचार्य जी से दीक्षा ली तथा भानगढ के जगलों में घोर तप किया एक दिन बातचीत के दौरान गुरू जी ने बताया कि बचपन से ही उन्हें साधू सन्त महात्माओं में बैठना उससे बातचीत करना अच्छा लगता था 4 बर्ष की अल्प आयु में ही गांव में आने वाले एक सन्त के श्रीमुख से
लिया दिया तेरे संग चलेगा धर्म कर्म का नाता है
साई नाम की चिन्ता कर ले देने वाला दाता है
घट में गंगा घट में ही जमना घट में ही गुरू का द्वारा है
घट में लागे बाग बगीचे घट में ही सींचन हारा है।
सुन कर भगवान श्री हरि की ओर प्रवत्त हुए और 9 वर्ष की आयु में ही "बालाजी" के संस्थापक महन्त श्री गणेश पुरी जी के सान्निध्य में आ गये और मन्दिर की व्यवस्था में हाथ बॅंटाने लगे थे।
गुरूजी ने अनुभव किया कि संसार में कुछ कष्ट ऐसे भी हैं कि जिन्हें भौतिक विधियों द्वारा दूर नहीं किया जा सकता हैं इसके लिए सूक्ष्म जगत की जानकारी तथा आत्मा के रहस्यों को जानना आवश्यक है । तभी गुरू जी ने व्रत लिया कि मैं इस प्रकार दैवी विपदाओं से घिर लोगों कै सहायता करूंगा ।इस उदेश्य की पूर्ति के लिए गुरू जी ने महन्त जी से भूत प्रेतादि विद्या के गूढ रहस्यों को सिखाने का अनुरोध किया तो महन्त जी ने उन्हें समझाया कि यह मार्ग बहुत कठिन है तुम इस सबसे दूर ही रहो । परन्तु गुरूजी चुंकि संकल्प कर चुके थे अत: सब बाधाओं कठिनाइयों को पार करते हुए विद्या में पारंगत हुए ।
श्री सुदर्शनाचार्य जी ने अपने को केवल इसी विद्या तक सीमित नहीं रखा ।दैवी प्रेरणा से व वन्दावन गये और वहां स्थित बड़ाखटला के स्वामी गोविन्दा चार्य जी से दीक्षा और उन्हीं के साान्नध्य में रहकर अपने अध्ययन कार्य को आगे बढाते हुए सम्पूर्णानन्द संस्कृत विद्यापीठ काशी से आचार्य ज्योतिषाचार्य आदि उच्च उपाधियां प्राप्त की ।यही रहते हुए वेए पुराण उपनिषद तथा दर्शन ग्रथों का अध्ययन किया। धर्म के तत्व को जाना और मन्त्रों की माहिमा का अनुभव ही नही किया उन्हें अपने वश में अपने अधीन कर लिया । यहां उल्लेखनीय है कि शास्त्रों के अनुसार
" देवाधीनमं. जगत सर्वम. मंत्राधीनम च: देवता
ते: मंत्रा गुरू आधीनम. तस्मै : श्री गुरूवे नम :।। "
यह संसार देवों के आधीन है और देवताओं को प्रसन्न कर उनसे मनवांछित आर्शावाद प्राप्त किया जा सकता है।सब विद्याओं में प्रवीण हो गुरू आदेश पाकर आप जनकल्याण को निकल पडें । कुछ समय अपने प्तौक गॉव पाड़ला में रहे । तत्पश्चात दिल्ली आ गये ।यहॉं डिफेन्स कालोनी कोटला में आपने अपना स्थान बनाया तथा श्रद्वालुओं की भौतिक दैहिक एवं विपदाओं का शमन करते हुए जन जन के श्रद्वेय बन गये। 14 वर्ष इस स्थान पर जनकल्याण करन्ो के पश्चात. आपने स्थान परिवर्तन कर लिया और फर्ीदाबाद आ गये । यहीं आपको दैवी आभास हुआ कि स्थापना के लिए उपयुक्त स्थान निकट ही कहीं है। और एक दिन अचानक ही आप वर्तमान आश्रम स्थल पर पहुचें और वहीं आश्रम बनाने का निर्णय लिया।
अरावली पर्वत की पवित्र शाखा में स्थित मेवला महाराज पुर गॉंव की यह जमीन "आश्रम " निर्माण हेतू 1983 में खरीद गयी। निर्मांण कार्य जारी है सिद्वदाता आश्रम एक भव्य रूप लेकर लोगों को आकर्षित कर रहा है।वैसे तो अरावली पर्वत की यह पुरी श्रखला ही ऋषियों की तपोभूमि है पर इसमें "श्री सिद्वदाता आश्रम " एक महत्वपूर्ण तीर्थ बन गये है।
आश्रम में स्थापित "देव दरबार " बारे में मान्यता है कि इसमें सभी देवी देवता साक्षात. वास करते हैं। यहां आने वाले हर व्यक्ति को उसके भाव श्रद्वा विश्वास के अनुसार तुरन्त फल मिलना प्रारंभ हो जाता है यहॉं गुरू जी की शक्तियों को देखकर भक्त उन्हें भगवान का साक्षात. अवतार मानने को विवश हो जाता है संम्भवतया यही कारण है कि प्रति दिन "आश्रम" आने वाले हजारों कांवड़ियाेें दूध एवं गगांजल गुरू जी पर उन्हें शिव रूप मानते हुए चढातें है। और उनकी पूजा अर्चना करते है।
कोई भी कार्य "गुरूजी" प्रसिद्वी पाने के लिए नहीं करते बल्कि इनका उद्देश्य तो व्यापक जन कल्याण हैं जनकल्याण हेतू किसी को मौत के मुहं से निकाल लेना किसी निसंतान दम्पति को सन्तान दे देना निर्धन को धनवान बना दिया किसी की गम्भीर से गम्भीर समस्या को चुटकियों मे हल कर डालना अर्थात दैहिक दैविक भौतिक तापों से बचाकर भक्त को तनाव मुक्त करके सुखपूर्वक प्रभु की ओर अग्रसर करना ।गुरू जी का लक्ष्य बन चुका है । गुरू जी की कृपा को पाने के लिए व्यक्ति में अटूट श्रदाभाव एवं अखण्ड विश्वास निर्धन हो गया धनवान आस्तिक हो या नास्तिक हिन्दू हो या मुसलमान सिक्ख हो या इसाई उसका उद्वार निश्चाित है।
आश्रम स्थित नव निर्मित आधनिक शीत यंत्रो से युक्त गऊशाला में गुरू जी को गायों की सेवा करते देखकर यह मानना पडेगा कि निसन्देह सभी जीव उनके लिए समान हैं और उनके आगे अपनी किसी भी भाषा को ज्यादा समझते हैं। गऊशाला किसी से दान दक्षिणा में ली गयी गायों से नहीं बनाई गयी बल्कि वे खरीदी गयीं हैं । गऊशाला में आ जाने के बाद कौन गाय दूध दे रही है इस प्रकार का चिन्तन किये बिना हर गाय को बराबर महत्व दिया जाता है "गुरू जी ने उन सबको नाम रखे हुए हैं जैसे गंगा सरस्वती यमुना आदि । सभी को हर समय इतना साफ सुथरा रखा जाता हैं जैसे अभी नहलाया धुलाया गया है । पौष्टिक आहार की पूरी व्यवस्था की गयी हैं।पूरे परिसर की सफाई पर इतना ध्यान दिया जाता है प्रत्येक गाय की हारी बीमारी पर उतना ही ध्यान दिया जाता है जितना अपने किसी भक्त पर दिया जाता है।
अपने काम पर से लौटते हुए कई गांववासी गऊशाला की दिवार के पास गुजरते हुए कुछ समय "गुरूजी" की ओर हाथ जोड़ प्रणाम करते और श्रद्वावंत निहारते हुए ऐसे लगते हैं जैसे उन्हें भगवान के दर्शन हो रहे है।
गत वर्ष अप्रैल माह में शाताब्दी के अन्तिम महाकुंभ के अवसर पर हरिद्वार की पावन धरा पर गुरूदेव को जगद्रगुरू रामानुजाचार्य की उपाधि से विभूषित तथा इन्द्रप्रस्थ एवं हरियाण प्ठाीाधीश्वर पद पर आसीन कर समस्त वैष्णव सम्प्रदाय ने स्वयं को गौरवान्वित अनुभव किया. इस अप्रत्याशित रूप से अत्यधिक वृद्वि हो गयी है. । "जगत गुरू " की व्याख्या करते हुए आप कहते है कि अब यह समस्त जगत मेरा गुरू हो गया है।
अनुभवों एवं आधार पर संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि जगद्रगुरू स्वामी सुदर्शना चार्य जी वास्तव में साधारण वेश में एक दिव्य पुरूष हैं । आप. का धरावरण विभिन्न कलेशों से दुखी जीवों के कल्याणार्थ हुआ है। |